*रेत से सिलिकॉन और सिस्टम तक* *भारत का सेमीकंडक्टर का दौर* *भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का बुनियादी स्तर से निर्माण*

जनपत की खबर , 20

*- नेहा कुमारी* 

*(लेखिका ‘गुजरात स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स मिशन’ की मिशन निदेशक हैं।)*

कई दशकों तक, सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भारत की स्थिति एक विरोधाभास वाली रही है। भारतीय इंजीनियरों ने उन्नत चिप्स को डिज़ाइन करने में मदद की,  लेकिन देश उनके निर्माण, पैकेजिंग और परीक्षण के लिए काफी हद तक विदेशी सुविधाओं पर निर्भर था। अब यह अंतर कम होने लगा है। 2021 में 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' शुरू होने के बाद से, भारत ने सिर्फ़ नीति बनाने से आगे बढ़कर कारखाने लगाने, आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने, प्रतिभाओं को प्रशिक्षित करने और व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
अगला काम सिर्फ़ अलग अलग सयंत्र लगाने से कहीं बड़ा है। एक सेमीकंडक्टर निर्माण सयंत्र अकेले काम करके सफल नहीं हो सकता। यह निरंतर पैकेजिंग और परीक्षण सुविधाओं, उपकरणों के रख-रखाव, अति-शुद्ध रसायनों और गैसों, सटीक इंजीनियरिंग, लॉजिस्टिक्स, अनुसंधान संस्थानों और कुशल कार्यबल पर निर्भर करता है। इन क्षमताओं को एक साथ करीब लाने से परिवहन और इन्वेंट्री लागत में कमी आती है, काम पूरा होने में लगने वाला समय घटता है, तालमेल बेहतर होता है और काम को अंजाम देने से जुड़े जोखिम कम होते हैं। इसलिए भारत को केवल अकेले फेब्रिकेशन संयंत्र नहीं, बल्कि एकीकृत सेमीकंडक्टर क्लस्टर बनाने होंगे।
भारत सरकार ने 76,000 करोड़ रुपये के 'सेमिकॉन इंडिया कार्यक्रम' तथा फैब्रिकेशन, असेंबली, परिक्षण, पैकेजिंग और चिप डिजाइन के लिए सहायता देकर इसकी मजबूत नींव रखी है। छह राज्यों में बारह सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है, जिनमें 1.64 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का निवेश किया जायेगा।  इनमें वेफर फैब्रिकेशन, उन्नत पैकेजिंग, मेमोरी असेंबली एवं परिक्षण, कंपाउंड सेमीकंडक्टर और विशिष्ट प्रौद्योगिकियां शामिल हैं। असम, गुजरात, ओडिशा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में चल रही परियोजनाएं एक-दूसरे की क्षमताओं को बढ़ाने में मदद कर रही हैं, जबकि डिजाइन कंपनियों, आधुनिक उन्नत उपकरण, फाउंड्री तक पहुंच और अकादमिक सहयोग के लिए दी जा रही सहायता से इसके नवप्रवर्तन की प्रक्रिया मज़बूत हो रही है।
'रेत से सिलिकॉन और सिस्टम तक' का सिद्धांत अब राष्ट्रीय प्रयास का मार्गदर्शन करने वाला होना चाहिए। भारत को वास्तविक लाभ तब होगा जब कच्चे माल और उपकरणों की आपूर्ति, चिप डिज़ाइन, फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, परिक्षण और इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के साथ आसानी से जुड़ जाएगी। एक ही जगह पर काम करने से आपूर्तिकर्ता प्रमाणीकरण में तेजी आ सकती है, अवसंरचना का साझा इस्तेमाल हो सकता है और निर्माता, स्टार्ट-अप व शोधकर्ता उत्पादन संबंधी समस्याओं को मिलकर हल कर सकते हैं। इससे घरेलू एमएसएमइ को भी सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने में मदद मिल सकती है; वे बड़े ग्राहकों के पास अपनी जगह बनाकर गुणवत्ता तथा विश्वसनीयता के वैश्विक मानकों को धीरे-धीरे पूरा करके सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश करने में मदद कर सकता है।
गुजरात यह दर्शाता है कि कैसे यह क्लस्टर दृष्टिकोण व्यापक राष्ट्रीय मिशन के तहत आकार ले सकता है। राज्य ने भारत की पहली समर्पित सेमीकंडक्टर नीति पेश की और एकल सुविधा प्रदाता के रूप में 'गुजरात स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स मिशन' की स्थापना की। अब तक छह स्वीकृत परियोजनाएं और 1.24 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश इसी राज्य में हो चूका है। हालांकि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि धोलेरा, साणंद और सूरत में फैब्रिकेशन, पैकेजिंग, अवसंरचना, आपूर्तिकर्ताओं और प्रतिभाओं के बीच बन रहा आपसी तालमेल है।
माइक्रोन प्रौद्योगिकी, केन्स सेमीकॉन और सीजी सेमी की सुविधाओं के आस-पास साणंद एक प्रमुख पैकेजिंग क्लस्टर के तौर पर विकसित हो रहा है।  गुजरात में तीन प्रमुख सुविधाओं ने 2026 में अपना व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया है। इनके परिचालन से उपकरणों, विशिष्ट रसायनों, औद्योगिक गैसों, क्लीनरूम, टेस्टिंग, लॉजिस्टिक्स और सटीक इंजीनियरिंग की निरंतर मांग बनी रहती है। यह मांग आपूर्तिकर्ताओं को आकर्षित कर सकती है, दूरस्थ सेवा नेटवर्क पर निर्भरता को कम कर सकती है और भारतीय प्रौद्योगिकी कंपनियों व एमएसएमई के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है।
धोलेरा फैब्रिकेशन के लिए एक मुख्य केंद्र के तौर पर काम करता है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर, वहाँ भारत का पहला व्यावसायिक सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई स्थापित कर रहा है। इसकी दोहरी ग्रिड बिजली आपूर्ति, सुनिश्चित जल आपूर्ति, अपशिष्ट उपचार सुविधाएं, एक्सप्रेसवे कनेक्टिविटी, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा और समर्पित औद्योगिक क्षेत्र सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए मजबूत अवसंरचना को दिखाते हैं। क्रिस्टल मैट्रिक्स की कंपाउंड-सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड-पैकेजिंग परियोजना तथा सूरत में सुची सेमिकॉन की सुविधा गुजरात के तकनीकी आधार और संभावित आपूर्तिकर्ता नेटवर्क का और अधिक विस्तार करती है।
क्लस्टरों को कारखानों को ज्ञान के केंद्रों से भी जोड़ना होगा। पंडित दीनदयाल ऊर्जा विश्वविद्यालय में पैकेजिंग प्रशिक्षण केंद्र, 'चिप-इन' एक्सटेंशन सेंटर और आईआईटी गांधीनगर में 'समर्थ' नैनोफैब्रिकेशन सुविधा उद्योग के अनुकूल प्रतिभा, अनुसंधान और प्रक्रिया विकास में मदद कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर, एंकर संयंत्रों, विश्वविद्यालयों, डिज़ाइन केंद्रों और साझा परीक्षण सुविधाओं के बीच इसी तरह के संबंध एक ऐसी क्षमता का निर्माण करने के लिए अनिवार्य होंगे जो शुरुआती निवेश प्रोत्साहनों के समाप्त होने के बाद भी बनी रहे।
कोई भी देश अकेले संपूर्ण सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण नहीं करता है। वैश्विक प्रौद्योगिकी साझेदारियां, पूंजी और बाजार हमेशा ज़रूरी रहेंगे। भारत के पास मौका है कि वह इन्हें बड़े घरेलू मार्केट, बेहतरीन इंजीनियरिंग प्रतिभा और भरोसेमंद संस्थानों के साथ जोड़े। 'सिलिकॉन टू सिस्टम्स: बिल्डिंग द इकोसिस्टम' विषय के तहत आयोजित सेमिकॉन इंडिया 2026, परियोजनाओं से आगे बढ़कर क्लस्टरों के निर्माण की ओर इस बदलाव को गति दे सकता है। गुजरात इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, लेकिन यह महत्वाकांक्षा राष्ट्रीय स्तर की है: ऐसे आपस में जुड़े हुए सेमीकंडक्टर क्लस्टर जो जोखिमों को कम करते हैं, घरेलू मूल्य संवर्धन करते हैं और भारत को चिप्स, प्रौद्योगिकियों और प्रणालियों का एक भरोसेमंद वैश्विक स्रोत बनाते हैं। अंततः, सफलता को कम समय अवधि, त्वरित प्रमाणीकरण और भारत के भीतर निर्मित मूल्य की बढ़ती हिस्सेदारी से मापा जाना चाहिए।

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