सुप्रीम कोर्ट ने लगाई गुजरात हाई कोर्ट के फ़ैसले पर मुहर
हेडलाइंस Jul 20, 2021 at 09:30 PM , 517नयी दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के उस फ़ैसले पर मुहर लगा दी है जिसमें सहकारिता से जुड़े 97वें संविधान संशोधन क़ानून को रद्द कर दिया गया था। इसके साथ ही केंद्र में अलग सहकारिता मंत्रालय बनाने पर सवालिया निशान लग गया है।
संविधान का 97वां संशोधन दिसंबर 2011 में संसद से पारित कर दिया गया था और यह फरवरी 2012 में लागू कर दिया गया। इसके तहत सहकारी संस्थाओं के कुशल प्रबंधन के लिए कई तरह के बदलाव किए गए थे।
22 अप्रैल 2013 को गुजरात हाई कोर्ट ने 97वें संविधान संशोधन की कुछ बातों को खारिज करते हुए कहा था कि केंद्र सहकारी संस्थाओं से जुड़े नियम नहीं बना सकता क्योंकि यह पूरी तरह राज्य का मामला है।
*क्या कहा बेंच ने ?*
जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस के. एम. जोसफ़ और जस्टिस बी. आर. गवई के खंडपीठ ने मंगलवार को एक अहम फ़ैसले में गुजरात हाई कोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया।
जस्टिस नरीमन और जस्टिस गवई ने 97वें संविधान संशोधन क़ानून के खंड 9बी को रद्द कर दिया। एक असहमति नोट में जस्टिस जोसेफ़ ने पूरे संविधान संशोधन क़ानून को ही रद्द कर दिया।
गुजरात हाई कोर्ट ने सहकारिता में क़ानून बनाने से जुड़े संविधान संशोधन क़ानून को इस आधार पर रद्द कर दिया था कि संविधान की धारा 368 (2) के प्रावधानों के तहत आधे से अधिक राज्यों की रज़ामंदी नहीं ली गई थी।
संविधान की अनुसूची सात के अनुसार सहकारिता राज्य सूची की 32वीं प्रविष्टि है। इसे वहां से निकाल कर केंद्र की सूची में डालने के लिए पारित होने वाले संविधान संशोधन को आधे से अधिक राज्य विधानसभाओं की सहमति चाहिए।
मंगलवार के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कोऑपरेटिव सोसाइटी संविधान की सातवीं अनुसूची की दूसरी सूची में है, लेकिन संसद ने अनुच्छेद 368 (2) का पालन किए बग़ैर विधानसभाओं के अधिकार क्षेत्र को नियंत्रित करने की कोशिश की है। उसे ऐसे करने के पहले आधे से अधिक राज्य विधानसभाओं से इसे पारित करवाना चाहिए था, जो नहीं किया गया है।'






_page-0001.jpg)






















Comments