बजट से पहले अर्थव्यवस्था का दुविधाग्रस्त सच: निवेश, कर्ज और मांग का संकट
जनपत की खबर Jan 01, 2026 at 06:55 AM , 333प्रधानमंत्री के साथ हुई बजट-पूर्व बैठक में अर्थशास्त्रियों द्वारा रखी गई चिंताएं भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा जटिल स्थिति को साफ़ तौर पर रेखांकित करती हैं। उन्होंने बढ़ती ब्याज एवं मूलधन चुकाने की देनदारी, कमजोर होती घरेलू बचत और सरकार के बढ़े हुए पूंजीगत निवेश के चलते निजी निवेश के समक्ष खड़ी हो रही कठिनाइयों की ओर ध्यान दिलाया। यह संकेत करता है कि आर्थिक वृद्धि के मौजूदा मॉडल की सीमाएं अब स्पष्ट रूप से सामने आने लगी हैं।
अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि जब सरकार बड़े पैमाने पर पूंजीगत निवेश के लिए बाजार से ऋण लेती है, तो इससे निजी निवेशकों के लिए कर्ज महंगा हो जाता है। इस ‘क्राउडिंग आउट’ प्रभाव के कारण निजी क्षेत्र का निवेश हतोत्साहित होता है, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं कही जा सकती। इसका सीधा असर यह होता है कि सरकार पर कर्ज और ब्याज चुकाने का बोझ लगातार बढ़ता जाता है। वर्तमान स्थिति यह है कि केंद्रीय बजट का एक चौथाई से भी अधिक हिस्सा केवल ऋण और ब्याज भुगतान में खर्च हो रहा है, जिससे सामाजिक और विकासात्मक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो जाते हैं।
हालांकि, इस तर्क का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सरकार अर्थशास्त्रियों की सलाह मानकर पूंजीगत निवेश में कटौती करती है, तो मौजूदा आर्थिक वृद्धि दर को बनाए रखना फिलहाल अत्यंत कठिन हो जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक पूंजीगत व्यय ही वह प्रमुख इंजन रहा है, जिसने अर्थव्यवस्था को गति प्रदान की है। ऐसे में इसे अचानक कम करना विकास की रफ्तार पर ब्रेक लगाने जैसा होगा।
निजी निवेश की कमजोरी का कारण केवल महंगा ऋण नहीं है। असल समस्या बाजार में मांग की कमी है। जब निजी क्षेत्र अपनी मौजूदा उत्पादन क्षमता का ही पूरा उपयोग नहीं कर पा रहा, तो वह नए निवेश का जोखिम क्यों उठाएगा? स्वयं अर्थशास्त्रियों ने इस तथ्य की ओर संकेत किया कि घरेलू बचत गिरकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग सात प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई है। यह गिरावट ऐसे समय में हो रही है, जब विदेशी पूंजी निवेश को लेकर वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता बढ़ी हुई है और चालू खाते का घाटा भी लगभग दो प्रतिशत बना हुआ है, जिसे पाटने के लिए घरेलू संसाधन पर्याप्त नहीं रह गए हैं।
घरेलू बचत में गिरावट का एक सामाजिक-आर्थिक संकेत भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह दर्शाता है कि आम परिवारों का बजट दबाव में है। जब महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च बढ़ता है, तो बचत स्वाभाविक रूप से घटती है। ऐसी स्थिति में उपभोग में वृद्धि की उम्मीद कैसे की जा सकती है? और जब उपभोग नहीं बढ़ेगा, तो मांग कमजोर रहेगी, जिससे निजी निवेश के लिए अनुकूल माहौल बन ही नहीं पाएगा।
इन तमाम कारकों को देखें, तो स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था एक प्रकार के दुश्चक्र में फंस गई है—कम मांग, कमजोर निजी निवेश, बढ़ता सरकारी कर्ज और घटती घरेलू बचत। इस बीच सरकार के लिए पूंजीगत निवेश घटाना एक जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है, लेकिन कर्ज और राजकोषीय घाटे को अनियंत्रित छोड़ देना भी दीर्घकाल में खतरनाक है।
सामान्य परिस्थितियों में ऋण और राजकोषीय घाटे के बीच संतुलन बनाने की सलाह पूरी तरह उचित मानी जाती। किंतु सवाल यह है कि क्या मौजूदा परिस्थितियों में इस सिद्धांत पर कठोरता से अमल करना व्यावहारिक होगा? शायद जरूरत इस बात की है कि बजट में ऐसे उपाय किए जाएं, जो एक ओर मांग को प्रोत्साहित करें, आम परिवारों की आय और बचत क्षमता बढ़ाएं, और दूसरी ओर निजी निवेश के लिए भरोसेमंद वातावरण तैयार करें।
सरकार ने अर्थशास्त्रियों की इन चेतावनियों और सुझावों से क्या ग्रहण किया है, इसका वास्तविक संकेत आगामी बजट में ही मिलेगा। बजट न केवल वित्तीय दस्तावेज होगा, बल्कि यह भी बताएगा कि सरकार इस जटिल आर्थिक दुविधा से निकलने के लिए कौन-सा रास्ता चुनती है।






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